Sunday, 29 November 2015

Bewajah

कभी बेवजह  सा दिन होते हुए देखा है?
तुम बिन मेरे दिन ऐसे ही हो गए हैं।
यूँ ही बेवजह से अलसायी हुई भोर का साथ छोड़ कर चले आते हैं, रस्म अदायगी करने।

फिर यूँ ही साँसों की तरह बेवजह सा गुजर जाता है दिन।
शाम भी तो ऐसी ही होती है तुम बिन।
अजीब सा सिलसिला है जो बस चलता जाता है।

अब आ भी जाओ कि इनको भी एक वजह मिले।